उर्दू शायरी · ग़ज़ल

roz shab-KHun marti hai hawas

रोज़ शब-ख़ून मारती है हवस

روز شب خون مارتی ہے ہوس

शायर: Vikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रोज़ शब-ख़ून मारती है हवस
रूह से रोज़ हारती है हवस

आरज़ू जुस्तुजू ज़रूरत-ए-इश्क़
नित-नया रूप धारती है हवस

डाह देती है जिस्म वालों को
चाहतों को उभारती है हवस

मैं मुदावा हूँ हर उदासी का
कह के गाहक पुकारती है हवस

एक आसेब है ख़ुदा का डर
और ये आसेब उतारती है हवस