उर्दू शायरी · ग़ज़ल

roz-o-shab sahib-e-takrar se baaten karna

रोज़-ओ-शब साहिब-ए-तकरार से बातें करना

روز و شب صاحب تکرار سے باتیں کرنا

शायर: Daniyal Haider Jafri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रोज़-ओ-शब साहिब-ए-तकरार से बातें करना
मश्ग़ला है मिरा दीवार से बातें करना

मशवरा है ये अज़िय्यत में बदलना राहत
और फिर बैठ के आज़ार से बातें करना

जाओ कुछ ज़ौक़-ए-फ़क़ीरी तो दिखाओ पहले
फिर किसी साहिब-ए-असरार से बातें करना

याद आता है वो सड़कों पे टहलना पहरों
और उस पर वो तिरा प्यार से बातें करना

वो भला कैसे लगाएगा 'अली का ना'रा
जिस को आता ही नहीं दार से बातें करना

मुझ को अपना न समझ फिर भी कोई बात तो कर
बा'इस-ए-अज्र है बीमार से बातें करना

दिल में जब ज़ात का 'इरफ़ान नुमू हो 'हैदर'
फिर किसी आइना-बरदार से बातें करना