उर्दू शायरी · ग़ज़ल

roz dil ko mere ek zaKHm naya dete hain

रोज़ दिल को मिरे इक ज़ख़्म नया देते हैं

روز دل کو مرے اک زخم نیا دیتے ہیں

शायर: Gauhar Shaikh Purwi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रोज़ दिल को मिरे इक ज़ख़्म नया देते हैं
आप क्या अपना बनाने की सज़ा देते हैं

मेरी बेताबी-ए-दिल का जो उड़ाते हैं मज़ाक़
वो भड़कते हुए शो'लों को हवा देते हैं

लोग कहते हैं जिसे ज़र्फ़ वो अपना है मिज़ाज
अपने दुश्मन से भी हम प्यार जता देते हैं

कोई आवाज़ नहीं होती भरे बर्तन से
और ख़ाली हों तो हर गाम सदा देते हैं

देख कर मेरे नशेमन से धुआँ उठता हुआ
सूखे पत्ते भी दरख़्तों के हवा देते हैं

ज़ख़्म-ए-दिल चाँद की मानिंद चमकते हैं मिरे
आप जब भूली हुई बात सुना देते हैं

आप चुप-चाप ही आते हैं तसव्वुर में मगर
मेरे ख़्वाबीदा ख़यालों को जगा देते हैं

सिर्फ़ इक देवता समझा है तुम्हें मैं ने मगर
लोग पत्थर को भी भगवान बना देते हैं

कच्ची दीवार की मानिंद हैं हम ऐ 'गौहर'
एक ठोकर से जिसे लोग गिरा देते हैं