उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ret-ghaDi ko bharti hai muTThi diwanon ki

रेत-घड़ी को भरती है मुट्ठी दीवानों की

ریت گھڑی کو بھرتی ہے مٹھی دیوانوں کی

शायर: Oan Raza6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रेत-घड़ी को भरती है मुट्ठी दीवानों की
इक लम्हे पर लग जाती है छाप ज़मानों की

जिस्म अगरचे ढाँप भी लो तो 'अक्स बरहना है
किस ने कहा था सैर करो आईना-ख़ानों की

लहरें लेते सर्व सुनाएँ इक झरने के गीत
राही दूर बहा ले जाए राह गुमानों की

अपनी ज़मीं को कब तक ढूँडे मेरे क़लम का हल
इतने में तो पक जाती है फ़स्ल किसानों की

कोरे काग़ज़ उलट रहा है कौन उदासी में
गहरे बादल टाप रहे हैं छतें मकानों की

अब के ऐसा खेल रचाया हिज्र के मौसम ने
आती है आबाद घरों से बू वीरानों की