उर्दू शायरी · ग़ज़ल

guzar raha tha main diye ki lau ke darmiyan se

गुज़र रहा था मैं दिए की लौ के दरमियान से

گزر رہا تھا میں دیے کی لو کے درمیان سے

शायर: Oan Raza6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुज़र रहा था मैं दिए की लौ के दरमियान से
ये पहला राब्ता था मेरा दूसरे जहान से

ख़िज़ाँ के ज्ञान से बदन तमाम ख़ुश्क हो गया
मगर चमन नुमू भी पा रहे हैं मेरे ध्यान से

ख़बर नहीं वो आग थी कि दो दिलों की लाग थी
लगी तो घर के सारे ख़्वाब ले गई मकान से

सिवाए ख़ामुशी के हम्द का न था मुझे दिमाग़
जब एक कह दिया तो दो नहीं कहा ज़बान से

सदा बुलंद हो यहाँ तो आफ़्ताब जाग उठे
शु'आ'-ए-तेज़-रौ सुबुक नहीं मिरी अज़ान से

बिल-आख़िर एक साए ने उसे भी 'औन' उचक लिया
मिला था जो चमकता ज़र मुझे सियाह कान से