उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rang-e-zulm-e-dast-e-wahshat jab numayan ho gaya

रंग-ए-ज़ुल्म-ए-दस्त-ए-वहशत जब नुमायाँ हो गया

رنگ ظلم دست وحشت جب نمایاں ہو گیا

शायर: Qadr Oraizi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रंग-ए-ज़ुल्म-ए-दस्त-ए-वहशत जब नुमायाँ हो गया
मंज़र-ए-क़ौस-ए-क़ुज़ह चाक-ए-गरेबाँ हो गया

औज-ओ-पस्ती देख कर वहशत की हैराँ हो गया
जब गरेबाँ दामन और दामन गरेबाँ हो गया

हो गया है अब तो बे-आज़ार जीना ना-गुज़ीर
दर्द समझा था जिसे हम ने वो दरमाँ हो गया

पा-ए-वहशत को मिरे बढ़ने नहीं देता कभी
अब तो कोताही में दामन भी गरेबाँ हो गया

है तहय्युर के लिए जब मेरी आँखों का वजूद
क्या ख़ता की देख कर तुम को जो हैराँ हो गया

हो गया है चीरा-दस्ती-ए-जुनूँ से चाक-चाक
अब गरेबाँ वाक़'ई मेरा गरेबाँ हो गया

हो गया है 'क़द्र' सा ज़ाबित परेशाँ-हाल अब
मुख़्तसर क़िस्सा ये ऐ ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ हो गया