उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rakhta hai zahiran jise zindan bandh kar

रखता है ज़ाहिरन जिसे ज़िंदान बाँध कर

رکھتا ہے ظاہراً جسے زندان باندھ کر

शायर: Oan Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रखता है ज़ाहिरन जिसे ज़िंदान बाँध कर
ज़ंजीर-ए-पा से बैठा है ऐवान बाँध कर

किस किस अदा से उस ने बनाया मुझे असीर
बाँहों को खोल कर कभी पैमान बाँध कर

आया तो झूमता रहा दरिया की नाफ़ में
लाया था अपने साथ जो तूफ़ान बाँध कर

गिरहें न खोल पाऊँगा मैं जानता है वो
दिल में ही छोड़ जाएगा सामान बाँध कर

लौट आया एक मौज-ए-'अरीज़ा बहा के मैं
दरिया से तेरी प्यास का अरमान बाँध कर

मिन्नत के धागे से मेरी क़िस्मत नहीं खुली
आया हूँ अब कि चाक गरेबान बाँध कर

पिंदार उस की याद के पीछे पड़ा था 'औन'
इक सम्त रख दिया है ये हैवान बाँध कर