उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raaz-e-ulfat ahl-e-duniya ko jo samjhane gae

राज़-ए-उल्फ़त अहल-ए-दुनिया को जो समझाने गए

راز الفت اہل دنیا کو جو سمجھانے گئے

शायर: Sabir Abuhari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

राज़-ए-उल्फ़त अहल-ए-दुनिया को जो समझाने गए
दर-ख़ुर-ए-दार-ओ-रसन वो लोग गर्दाने गए

'सरमद'-ए-जाँ-बाज़ था ईसा था या 'मंसूर' था
शम्अ' की लौ तक यही दो-चार परवाने गए

मय-कदे का मय-कदा रूस्वा-ए-आलम हो गया
जिस किसी कम-ज़र्फ़ तक लबरेज़ पैमाने गए

अहल-ए-अक़्ल-ओ-होश ने क्या क्या न तोड़े उन पे ज़ुल्म
उस पे भी सौ सौ दुआएँ दे के दीवाने गए

नौ-ए-इंसाँ को मिले जिन से मय-ए-उल्फ़त के जाम
अब कहाँ ऐ साक़ी-ए-रा'ना वो मय-ख़ाने गए

मय-कदे ही में मिला कुछ तेरी हस्ती का निशाँ
दैर-ओ-का'बा में भी यूँ तो तेरे दीवाने गए

'साबिर'-ए-नादाँ न समझा इश्क़ के अंजाम को
जाने कितनी बार उस को हम भी समझाने गए