उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raaz dar-parda-e-dastar-o-qaba jaanti hai

राज़ दर-पर्दा-ए-दस्तार-ओ-क़बा जानती है

راز در پردۂ دستار و قبا جانتی ہے

शायर: Zaheer Ahmad10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

राज़ दर-पर्दा-ए-दस्तार-ओ-क़बा जानती है
कौन किस भेस में है ख़ल्क़-ए-ख़ुदा जानती है

कौन से दीप नुमाइश के लिए छोड़ने हैं
किन चराग़ों को बुझाना है हवा जानती है

ये कभी मुझ को अकेला नहीं होने देती
मेरी तन्हाई मुझे तुम से सिवा जानती है

आप ईजाद करें जौर-ओ-सितम रोज़ नए
भूल जाने का हुनर मेरी वफ़ा जानती है

नश्शा-ए-‘इश्क़ मुझे और ज़रा कर मदहोश
बे-ख़ुदी मेरी अभी मेरा पता जानती है

दश्त मंज़ूर है लेकिन मुझे मंज़ूर नहीं
ऐसी बस्ती जो शराफ़त को ख़ता जानती है

कौन से बुत हैं जिन्हें दस्त-ए-पयम्बर तोड़े
उम्मत-ए-हिर्स तो पैसे को ख़ुदा जानती है

निस्बतें लाख बदल डाले ज़माना लेकिन
एक दुनिया तो मुझे अब भी तिरा जानती है

इक मिरी चश्म-ए-तमाशा है कि होती नहीं सैर
फ़िक्र-ए-मंज़िल है कि रुकने को बुरा जानती है

मेरे अल्फ़ाज़ हैं दर-अस्ल क़लम के आँसू
रौशनाई लहू बनने की अदा जानती है