उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raat ka bujhta diya din ka ishaara chahe

रात का बुझता दिया दिन का इशारा चाहे

رات کا بجھتا دیا دن کا اشارہ چاہے

शायर: Parveen Shaghaf6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रात का बुझता दिया दिन का इशारा चाहे
जिस्म गिरने को है मिट्टी का सहारा चाहे

हम ने दर खोल दिए खोल दिए सब रौज़न
अब परिंदा भी बहारों का नज़ारा चाहे

बोझ मौजों का उठाएगा ये तिनका कब तक
अब तो ये भी किसी दरिया का किनारा चाहे

तुझ को चाहा था ख़ता दिल ने यही की थी बस
अब ये दिल अपने गुनाहों का ख़सारा चाहे

बे-सबब कोई नहीं देता है दफ़ना ख़ुद को
अपने जीने को वो इक बार दुबारा चाहे

ऐ ख़ुदा 'इश्क़ पे रखना तू 'शग़फ़' के पर्दा
ये ज़माना तो मोहब्बत पे इजारा चाहे