उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raat guzri to yaqin tha ki sawera hoga

रात गुज़री तो यक़ीं था कि सवेरा होगा

رات گزری تو یقیں تھا کہ سویرا ہوگا

शायर: Vafa Malikpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रात गुज़री तो यक़ीं था कि सवेरा होगा
क्या ख़बर थी कि वही घोर-अँधेरा होगा

राह में जिन से था साया वो शजर सूख गए
अब ख़ुदा जाने कहाँ अपना बसेरा होगा

ना-शनासान-ए-मोहब्बत से तवक़्क़ो है फ़ुज़ूल
जो ख़ुद अपना न हुआ किस तरह मेरा होगा

हम-नशीनो शब-ए-फ़ुर्क़त को ग़नीमत समझो
अब कोई शाम न होगी न सवेरा होगा

आस्तीनों में है साँप अपने छुपाए जो शख़्स
वो मिरा दोस्त हो क्यों कोई सपेरा होगा

तूल खींचा है बहुत तीरा-शबी ने लेकिन
तबल-ए-सुब्ह के बजते ही सवेरा होगा

सुब्ह-ए-सादिक़ की शुआएँ ये बताती हैं 'वफ़ा'
सुब्ह-ए-काज़िब का बस अब दूर अंधेरा होगा