उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raat guzri phir andhera chha gaya

रात गुज़री फिर अंधेरा छा गया

رات گزری پھر اندھیرا چھا گیا

शायर: Aal-e-Raza Raza9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रात गुज़री फिर अंधेरा छा गया
अपना सूरज दिन चढ़े गहना गया

हम न जाने कौन आलम में रहे
वक़्त काटा जी न बहलाया गया

बस यही था उन को पत्थर दिल पे नाज़
ज़ुल्म फ़रमाएँ तरस क्यों आ गया

म'अरका-आरा हुए थे हुस्न-ओ-इश्क़
बीच में दिल आ गया मारा गया

चौदहवीं के चाँद वाली रात में
चाँद निकला था कि बादल छा गया

क्या समझ सकते मोहब्बत का फ़रेब
यूँ तो समझे जिस क़दर समझा गया

हम सर-ए-राह-ए-वफ़ा सुनते रहे
कह गया अपनी सी हर आया गया

आने वाला था अंधेरा रात का
शाम होते दूर तक साया गया

वज़्अ-ए-ख़ुद्दारी निबाही तो मगर
ऐ 'रज़ा' दाँतों पसीना आ गया