उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raat do raat ka basera hai

रात दो रात का बसेरा है

رات دو رات کا بسیرا ہے

शायर: D. Raj Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रात दो रात का बसेरा है
ज़िंदगी जोगियों का फेरा है

बुझ गया चाँद सो गए तारे
दूर कितना अभी सवेरा है

'उम्र भर नाचता नचाता है
ग़म भी गोया कोई सपेरा है

वक़्त की सादगी पे मत जाओ
वक़्त सब से बड़ा लुटेरा है

रौशनी छन रही है हर जानिब
फिर भी हर रास्ता अंधेरा है

जाम का सिलसिला दराज़ रहे
मै-कदा ज़िंदगी का डेरा है

दिल पे गुज़रे जो हादसात 'कँवल'
उन को अश'आर में बिखेरा है