उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bashar ko jis se mayassar kabhi KHushi na hui

बशर को जिस से मयस्सर कभी ख़ुशी न हुई

بشر کو جس سے میسر کبھی خوشی نہ ہوئی

शायर: D. Raj Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बशर को जिस से मयस्सर कभी ख़ुशी न हुई
वो इक मज़ाक़ हुआ कोई ज़िंदगी न हुई

नज़र किसी की उजालों से भर गई दामन
चराग़ हम ने जलाए तो रौशनी न हुई

ख़ुदा की आड़ में कुछ लोग पूजते हैं सनम
इसे फ़रेब कहो ये तो बंदगी न हुई

तुम्हारी याद के मरहम से भी सुकूँ न मिला
किसी तरह भी मिरे दर्द में कमी न हुई

वो जिस पे हम भी उमीदों के गुल खिला सकते
वो शाख़ सहन-ए-चमन में कभी हरी न हुई

अगर है ‘इश्क़-ए-हक़ीक़ी तो जाँ निसार करो
सलीब-ओ-दार से डरना तो 'आशिक़ी न हुई

हज़ार शिकवे गिले लब पे रक़्स करते रहे
वो जब मिले तो 'कँवल' हम से बात भी न हुई