उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qismat mein KHushi jitni thi hui aur gham bhi hai jitna hona hai

क़िस्मत में ख़ुशी जितनी थी हुई और ग़म भी है जितना होना है

قسمت میں خوشی جتنی تھی ہوئی اور غم بھی ہے جتنا ہونا ہے

शायर: Aal-e-Raza Raza5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़िस्मत में ख़ुशी जितनी थी हुई और ग़म भी है जितना होना है
घर फूँक तमाशा देख चुके अब जंगल जंगल रोना है

हस्ती के भयानक नज़्ज़ारे साथ अपने चले हैं दुनिया से
ये ख़्वाब-ए-परेशाँ और हम को ता-सुब्ह-ए-क़यामत सोना है

दम है कि है उखड़ा उखड़ा सा और वो भी नहीं आ चुकते हैं
क़िस्मत में हो मरना या जीना अब हो भी चुके जो होना है

दिल ही तो है आख़िर भर आया तुम चीं-ब-जबीं क्यूँ होते हो
हम तुम को भला कुछ कहते हैं तक़दीर का अपनी रोना है

ग़म काहे का यारो मातम क्या बदलोगे निज़ाम-ए-आलम क्या
मरना था 'रज़ा' को मरता है ये काहे का रोना धोना है