उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qadam baDhane se pahle ye dekhna bhi hai

क़दम बढ़ाने से पहले ये देखना भी है

قدم بڑھانے سے پہلے یہ دیکھنا بھی ہے

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़दम बढ़ाने से पहले ये देखना भी है
सफ़र के रंज उठाने का हौसला भी है

जहाँ ग़ुरूब हुई हैं पुरानी आवाज़ें
वहाँ उभरती हुई इक नई सदा भी है

नहीं ये फ़िक्र कि इक भीड़ है हरीफ़ों की
कोई तो शख़्स यहाँ मेरा हम-नवा भी है

अज़िय्यतों से भी हम को गुज़रते रहना है
हर एक मोड़ पे ख़ुद को सँभालना भी है

नहीं है इतना भी एहसास संग-बारों को
कि उन के सामने दिल जैसा आइना भी है

जिन्हों ने शहर को लूटा है उन से कोई कहे
कि बा'ज़ लोगों के तन पर अभी क़बा भी है

जदीद होने का दा'वा मुझे नहीं 'मंज़र'
कि मेरे साथ रिवायत का सिलसिला भी है