उर्दू शायरी · ग़ज़ल

qafile luT gae sar nok-e-sinan tak pahunche

क़ाफ़िले लुट गए सर नोक-ए-सिनाँ तक पहुँचे

قافلے لٹ گئے سر نوک سناں تک پہنچے

शायर: Jaani Lakhnavi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क़ाफ़िले लुट गए सर नोक-ए-सिनाँ तक पहुँचे
जब बहारों के तलबगार ख़िज़ाँ तक पहुँचे

आप का इश्क़ मसाफ़त है तो बस इतना कि हम
दश्त-ए-इम्काँ से चले दश्त-ए-ज़ियाँ तक पहुँचे

हम से पूछो कि सिमट आता है कैसे गिर्या
लम्हे लम्हे का सफ़र बार-ए-गराँ तक पहुँचे

मेरे हिस्से में दिलासे पे दिलासे आए
ख़ुश-नसीबान-ए-सफ़र तेरी अमाँ तक पहुँचे

मुद्दतों ख़ाक उड़ाई गई सहरा सहरा
तब कहीं जा के तिरे नाम-ओ-निशाँ तक पहुँचे

बारहा ज़ब्त-ए-मुसलसल को बिखरते देखा
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़ वो जब मेरी ज़बाँ तक पहुँचे

फिर नई राह नज़र आने लगी है मुझ को
जब मिरे सारे यक़ीं हुस्न-ए-गुमाँ तक पहुँचे