उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pindar ki viran-sara mein nahin rahte

पिंदार की वीरान-सरा में नहीं रहते

پندار کی ویران سرا میں نہیں رہتے

शायर: Zaheer Ahmad10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पिंदार की वीरान-सरा में नहीं रहते
हम ख़ाक पे रहते हैं ख़ला में नहीं रहते

क़ामत भी हमारी है लबादा भी हमारा
माँगी हुई दस्तार-ओ-क़बा में नहीं रहते

हम कशमकश-ए-दहर के पाले हुए इंसान
हम गिर्या-कुनाँ कर्ब-ओ-बला में नहीं रहते

ख़ाशाक-ए-ज़माना हैं नहीं ख़ौफ़ हमें कोई
आँधी से डरें वो जो हवा में नहीं रहते

हम छोड़ भी देते हैं खुला तौसन-ए-दिल को
थामे हुए हर वक़्त लगामें नहीं रहते

रूहों में उतर जाते हैं तेज़ाब की सूरत
लफ़्ज़ों में घुले ज़हर सदा में नहीं रहते

एहसास के मौसम कभी हो जाएँ जो बे-रंग
ख़ुशबू के हुनर दस्त-ए-सबा में नहीं रहते

ऊँचा न उड़ो अपनी ज़रूरत से ज़ियादा
थक जाएँ परिंदे तो फ़ज़ा में नहीं रहते

दस्तार बने जाते हैं अब शहर-ए-तलब में
कश्कोल कि अब दस्त-ए-गदा में नहीं रहते

इस ख़ाना-बदोशी में ख़ुदा लाए न वो दिन
जब बिछड़े हुए यार दु'आ में नहीं रहते