उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phul jo sahn-e-bayaban mein jawan hota hai

फूल जो सहन-ए-बयाबाँ में जवाँ होता है

پھول جو صحن بیاباں میں جواں ہوتا ہے

शायर: D. Raj Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फूल जो सहन-ए-बयाबाँ में जवाँ होता है
‘अज़्मत-ए-फ़स्ल-ए-बहाराँ का निशाँ होता है

क़तरा-ए-अश्क को समझो न ज़रा सा पानी
क़तरा-ए-अश्क ग़म-ए-दिल की ज़बाँ होता है

हैं ये बे-कार सभी दैर-ओ-हरम के झगड़े
ला-मकाँ हो जो कहीं उस का मकान होता है

जब भी आती है कभी फ़स्ल-ए-बहाराँ ऐ दोस्त
आस-पास उस के कहीं दौर-ए-ख़िज़ाँ होता है

जाने क्या सोच के हो जाता हूँ मैं भी ग़मगीं
जब भी महफ़िल में कभी ज़िक्र-ए-बुताँ होता है

आज के दौर में इंसान न ढूँडो यारो
आज के दौर में इंसान कहाँ होता है

अपनी तहज़ीब की ये आख़िरी मंज़िल है 'कँवल'
रेग-ज़ारों पे बहारों का गुमाँ होता है