उर्दू शायरी · ग़ज़ल

patthar pe bhi KHaka tera khincha nahin jata

पत्थर पे भी ख़ाका तिरा खींचा नहीं जाता

پتھر پہ بھی خاکہ ترا کھینچا نہیں جاتا

शायर: Qadr Oraizi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पत्थर पे भी ख़ाका तिरा खींचा नहीं जाता
बुत भी तिरी सूरत का तराशा नहीं जाता

बे-लाग नज़र से तुझे देखा नहीं जाता
अंदाज़-ए-नज़र अपना छुपाया नहीं जाता

कर भूल के तू उस से न ज़िक्र अपनी वफ़ा का
महबूब को एहसान जताया नहीं जाता

बाज़ आते नहीं ज़ुल्म-ओ-सितम करने से फिर भी
कहते हैं तड़पना तिरा देखा नहीं जाता

जाँ साथ लिए जाऊँगा कहता है ग़म-ए-इश्क़
आया हूँ अकेला मैं अकेला नहीं जाता

गो वो है जफ़ा-केश जफ़ा-साज़ जफ़ा-गर
सूरत से मगर उस की ये पाया नहीं जाता

मजबूर-ए-मोहब्बत को सँभालेंगे कहाँ हम
दिल अपना ख़ुद अपने से सँभाला नहीं जाता

ग़ाएब हुए वो जब से जमाल अपना दिखा कर
आँखों में जो आया है अंधेरा नहीं जाता

दुश्वार नहीं कोह-ए-अलम सर पे उठाना
ज़िल्लत का मगर बार उठाया नहीं जाता

ऐ 'क़द्र' नज़र दीद से ऐसी हुई ख़ीरा
जल्वे का तसव्वुर भी जमाया नहीं जाता