उर्दू शायरी · ग़ज़ल

parinde ko bharam hai uD raha hai

परिंदे को भरम है उड़ रहा है

پرندے کو بھرم ہے اڑ رہا ہے

शायर: Deepak Kamil12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

परिंदे को भरम है उड़ रहा है
उड़ाने वाला कोई दूसरा है

ग़रज़ की डोर से लिपटे हैं वर्ना
जहाँ में कौन किस को चाहता है

उन्हें बस भूल ही सकते नहीं हम
अगरचे भूलने का क़ा'एदा है

भला इस दिल सा पाजी कौन होगा
हमारे साथ है और लापता है

भरोसा तोड़ने वाला यहाँ पर
'अजब है कि भरोसा चाहता है

हमारे ख़ात्मे का सोचना ही
तुम्हारे ख़ात्मे की इब्तिदा है

यक़ीनन रास्ते तो हैं कई पर
ख़मोशी रास्तों का रास्ता है

बड़ा मुश्किल है कुछ वो ढूँढना जो
हमारे पास है और काम का है

भला वो बादशह कैसे बनेगा
ग़ुलामों की तरह जो सोचता है

अगर है दूसरों पर तो है घातक
भरोसा ख़ुद पे है तो काम का है

मुक़द्दर खींच लाया हम को वर्ना
ख़ुशी से कौन घर को छोड़ता है

किसी भी वार से दुश्मन को 'कामिल'
नज़र-अंदाज़ करना मारता है