उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jo nahin rakhni thin wo sab chuppiyan mahfuz hain

जो नहीं रखनी थीं वो सब चुप्पियाँ महफ़ूज़ हैं

جو نہیں رکھنی تھیں وہ سب چپیاں محفوظ ہیں

शायर: Deepak Kamil8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जो नहीं रखनी थीं वो सब चुप्पियाँ महफ़ूज़ हैं
आप को भेजी नहीं जो चिट्ठियाँ महफ़ूज़ हैं

जिस्म से ज़िंदा हूँ लेकिन मन मिरा है मर चुका
या'नी बल तो जल चुके हैं रस्सियाँ महफ़ूज़ हैं

आ गया दफ़्तर में क्यों मैं घर से बच कर आज भी
जब कि मेरी साल भर की छुट्टियाँ महफ़ूज़ हैं

तब तलक देने पड़ेंगे पास होने के सुबूत
दूरियाँ जब तक हमारे दरमियाँ महफ़ूज़ हैं

मुफ़लिसों को दी थीं जितनी आप ने वो सब कि सब
नामा-ए-आ'माल में वो सिसकियाँ महफ़ूज़ हैं

सोचता हूँ याद आना आप का आख़िर है क्या
जल चुका है पेड़ तो क्यों पत्तियाँ महफ़ूज़ हैं

दिल में तेरी याद की जो बस गई हैं बस्तियाँ
जल रहा है दिल मगर वो बस्तियाँ महफ़ूज़ हैं

इस क़दर ख़ुद को सताना ज़ख़्म खाना भूलना
आप में 'कामिल' ये कैसी ख़ूबियाँ महफ़ूज़ हैं