उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHud ki ruh jalai hai

ख़ुद की रूह जलाई है

خود کی روح جلائی ہے

शायर: Deepak Kamil6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़ुद की रूह जलाई है
फिर ये क़लम उठाई है

ख़ाली तेरा दोश नहीं
क़िस्मत भी हरजाई है

शाइ'र निकलो पन्नों से
घर में रोटी ढाई है

दिल्ली सारी झुलस गई
किस ने आग लगाई है

झूठा हँसना ग़लत नहीं
ये ग़म की तुरपाई है

'दीपक' छोड़ो दुनिया अब
रब के घर सुनवाई है