उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahunchi na dil ki baat hudud-e-payam tak

पहूँची न दिल की बात हुदूद-ए-पयाम तक

پہونچی نہ دل کی بات حدود پیام تک

शायर: Aal-e-Raza Raza7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहूँची न दिल की बात हुदूद-ए-पयाम तक
बाक़ी हैं उन पे कितने जवाब-ए-सलाम तक

बुत-ख़ाना-साज़ रंग-ए-ज़माना है किस क़दर
छोड़ा न उस ने का'बा-ए-आली-मक़ाम तक

मानूस हो रहे हैं तिरी जल्वा-गाह से
पहोंचे अभी हैं मंज़िल-ए-माह-ए-तमाम तक

जब तक रहे वो मेरी निगाहों के सामने
ठहरी न एक रुख़ से अदा-ए-ख़िराम तक

दिल दे के उन को आप से ऐसे गुज़र गए
जैसे कि हम थे सिर्फ़ इसी इंतिज़ाम तक

अंजाम-ए-कार शब के अंधेरे में लुट गया
रक्खा था कैफ़-ए-सुब्ह बचा कर जो शाम तक

इस तरह कर रहे हैं 'रज़ा' का वो तज़्किरा
ख़ाली नहीं है तंज़ से हुस्न-ए-कलाम तक