उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahunch kar mai-kade ke dar pe yun aai hansi mujhko

पहुँच कर मय-कदे के दर पे यूँ आई हँसी मुझ को

پہنچ کر میکدے کے در پہ یوں آئی ہنسی مجھ کو

शायर: D. Raj Kanwal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहुँच कर मय-कदे के दर पे यूँ आई हँसी मुझ को
कि ले आई कहाँ आख़िर ये मेरी तिश्नगी मुझ को

बहुत सोचा है लेकिन ये नहीं समझा कि आख़िर क्यों
अँधेरों में लिए फिरती है अक्सर रौशनी मुझ को

रह-ए-उल्फ़त में समझाते रहे इक दूसरे को हम
कभी दीवानगी को मैं कभी दीवानगी मुझ को

तुझे ऐ गर्दिश-ए-दौराँ लगा लेता गले लेकिन
सँभलने ही नहीं देती है मेरी बे-ख़ुदी मुझ को

मैं हर इक राह-रौ से पूछता हूँ राह मंज़िल की
मुझे डर है कि ले डूबेगी मेरी सादगी मुझ को

अभी तो ज़ख़्म खाए हैं अभी तो दिल ही टूटा है
ख़ुदा जाने अभी क्या क्या दिखाए दिल-लगी मुझ को

हुई मुद्दत सुकून-ए-दिल 'कँवल' जाता रहा अपना
बहुत महँगी पड़ी है ज़िंदगी से दोस्ती मुझ को