उर्दू शायरी · ग़ज़ल

paD gaya tha qadam KHauf ki miKH par

पड़ गया था क़दम ख़ौफ़ की मीख़ पर

پڑ گیا تھا قدم خوف کی میخ پر

शायर: Umair Najmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पड़ गया था क़दम ख़ौफ़ की मीख़ पर
रात क़ाबू नहीं रख सका चीख़ पर

आँसुओं के ज़री'ए हुए दस्तख़त
अन-लिखे ‘अहद-नामे की तनसीख़ पर

इन परिंदों को आज़ादी महँगी पड़ी
तब सलाख़ों में थे और अब सीख़ पर

ये लहू-रंग क्यों है मुझे 'इल्म है
दूसरी कर्बला होगी मिर्रीख़ पर

एक खे़मे के प्यासों पर आ कर रुकी
गुफ़्तुगू थी चराग़ों की तारीख़ पर

धँस रही हैं तभी मेरी आँखें 'उमैर'
बैठ जाते हैं जो घर हों नम बीख़ पर