उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nazar Thaharti nahin hai ruKH aaftab hi hai

नज़र ठहरती नहीं है रुख़ आफ़्ताब ही है

نظر ٹھہرتی نہیں ہے رخ آفتاب ہی ہے

शायर: Umair Najmi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नज़र ठहरती नहीं है रुख़ आफ़्ताब ही है
यक़ीन कर तिरी बे-पर्दगी हिजाब ही है

तुम्हारा साथ इक ए'ज़ाज़ी 'ओहदा है जिस में
कुछ इख़्तियार नहीं दोस्त ए'ज़ाज़ी ही है

हमारी ऊँघ कभी नींद तक गई ही नहीं
सो ख़्वाब देखना ता-हाल एक ख़्वाब ही है

क़सम ख़ुदा की बड़ी देर कुछ नहीं दिखता
ब-ग़ौर उस की तरफ़ देखना 'अज़ाब ही है

मिरा बदन भी कम-ओ-बेश है ज़मीं की तरह
कि दो तिहाई तो इस का भी ज़ेर-ए-आब ही है

ख़राब रस्ते पे तख़्ती दिखी तो रुक के पढ़ी
लिखा था रस्ता यही है मगर ख़राब ही है

हम एक हाथ की दूरी पे साथ फिरते हैं
वो दस्तरस में नहीं है वो दस्तयाब ही है

तिरी तलब अगर आसूदगी है रब-राखा
हमारे पास तो ले दे के इज़्तिराब ही है

मैं कुछ भी पूछे बग़ैर उठ के आ गया 'नजमी'
समझ गया था उसे देख कर जवाब ही है