उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nasha daulat ka kuchh aisa chaDha hai

नशा दौलत का कुछ ऐसा चढ़ा है

نشہ دولت کا کچھ ایسا چڑھا ہے

शायर: Yaseen Ansari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नशा दौलत का कुछ ऐसा चढ़ा है
ज़मीं पर वो अकड़ कर चल रहा है

भलाई का नहीं कुछ भी सिला क्या
भलाई करने वाला सोचता है

मगर हिम्मत भी है हमराह मेरे
सफ़र तो वाक़'ई काँटों-भरा है

हद-ए-मंज़िल में अब मेरे क़दम हैं
बहुत कम फ़ासला अब रह गया है

ज़माने की शिकायत कर रहे हो
बताओ तुम ने इस को क्या दिया है

कहाँ मैं और कहाँ फ़न शा'इरी का
यक़ीनन ये मिरे रब की 'अता है

मिला 'यासीन' से जो अपना बन कर
भरोसा इस ने उस पर कर लिया है