उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kahan manzar KHushi ke baDh rahe hain

कहाँ मंज़र ख़ुशी के बढ़ रहे हैं

کہاں منظر خوشی کے بڑھ رہے ہیں

शायर: Yaseen Ansari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कहाँ मंज़र ख़ुशी के बढ़ रहे हैं
मसाइल ज़िंदगी के बढ़ रहे हैं

गले मिल कर उन्हें हम अब कतर दें
जो नाख़ुन दुश्मनी के बढ़ रहे हैं

सिमटते जा रहे हैं अब उजाले
तमाशे तीरगी के बढ़ रहे हैं

तरक़्क़ी पर है अब बे-रोज़गारी
कि साए मुफ़लिसी के बढ़ रहे हैं

हमारी जेब ख़ाली हो रही है
ख़ज़ाने सेठ जी के बढ़ रहे हैं

उदासी में नहीं मेरी इज़ाफ़ा
कि रंज-ओ-ग़म सभी के बढ़ रहे हैं

ग़ज़ल 'यासीन' वुस'अत पा रही है
मज़ामीं शा'इरी के बढ़ रहे हैं