उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum bahut kam par bhi raazi ho gae

हम बहुत कम पर भी राज़ी हो गए

ہم بہت کم پر بھی راضی ہو گئے

शायर: Yaseen Ansari6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम बहुत कम पर भी राज़ी हो गए
ख़्वाहिशों के फूल बासी हो गए

सच बयाँ करना बग़ावत है अगर
तो समझ लो हम भी बाग़ी हो गए

कल जो दौलत के नशे में चूर थे
उन के लहजे अब सवाली हो गए

'इश्क़ में नाकाम होने वालों में
कुछ तो पागल कुछ शराबी हो गए

किस लिए सहमी हैं कलियाँ क्या हुआ
गुल फ़सुर्दा कैसे माली हो गए

क्या लड़ेंगे ज़ुल्म से 'यासीन' वो
ज़ुल्म सहने के जो 'आदी हो गए