उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek nae rup nae rang mein Dhal jata hai

इक नए रूप नए रंग में ढल जाता है

اک نئے روپ نئے رنگ میں ڈھل جاتا ہے

शायर: Yaseen Ansari6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक नए रूप नए रंग में ढल जाता है
वक़्त के साथ हर इंसान बदल जाता है

मंज़िलें ज़ेर-ए-क़दम उस के चली आती हैं
ठोकरें खा के मुसाफ़िर जो सँभल जाता है

साज़िशें तेरी न कर पाएँगी हम को बर्बाद
आंधियों में भी चराग़ अपना तो जल जाता है

हम निकलते नहीं बाहर कभी ख़ुद्दारी से
उन का हर काम ख़ुशामद से निकल जाता है

वैसे तो पेश नहीं आता मोहब्बत से कभी
जब ग़रज़ हो तो तिरा लहजा बदल जाता है

क्या ज़रूरी है बुलंदी से ही फिसले कोई
पाँव पस्ती में भी 'यासीन' फिसल जाता है