उर्दू शायरी · ग़ज़ल

namkin hai kahin to kahin be-namak nami

नमकीन है कहीं तो कहीं बे-नमक नमी

نمکین ہے کہیں تو کہیں بے نمک نمی

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नमकीन है कहीं तो कहीं बे-नमक नमी
उतरी हुई है मुझ में बड़ी दूर तक नमी

होता है हिज्र पाँच 'अनासिर पे मुश्तमिल
उम्मीद इंतिज़ार उदासी कसक नमी

फिर सोचा ‘अन-क़रीब तही-चश्म हो न जाऊँ
पहले तो मैं लुटाता रहा बे-धड़क नमी

मुझ में छुपे हुनर को किया ग़म ने यूँ 'अयाँ
मिट्टी पे गिर के जैसे उड़ा दे महक नमी

साकिन हैं चुप हैं ज़र्द हैं मैं और ये पहाड़
हम में बस एक चीज़ नहीं मुश्तरक नमी

तख़्लीक़ के लिए ये फ़ज़ा साज़गार है
हल्की फुहार ख़ामुशी ख़ाली सड़क नमी

गिर्ये ने यूँ भरे हैं हमारी जलन में रंग
जैसे किरन को छू के बना दे धनक नमी