उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nai sahar hai ye logo naya sawera hai

नई सहर है ये लोगो नया सवेरा है

نئی سحر ہے یہ لوگو نیا سویرا ہے

शायर: Vafa Malikpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नई सहर है ये लोगो नया सवेरा है
तुलूअ' हो चुका सूरज मगर अँधेरा है

ख़ुदा ही जाने ये दिल कब ख़ुदा का घर होगा
अभी तो इस में बुतान-ए-हवस का डेरा है

अभी न दे मुझे आवाज़ ऐ ग़म-ए-जानाँ
अभी तो शहर-ए-वफ़ा में बड़ा अँधेरा है

न साएबान न आँगन न छत न रौशन-दान
और इस पे सब से लड़ाई कि घर ये मेरा है

ये दार-ओ-गीर की दुनिया में कहना मुश्किल है
कि कौन इस में लुटा कौन याँ लुटेरा है

ये सारे झगड़े हैं बस एक दो पहर के लिए
कि नूर-ए-मेहर न मेरा है और न तेरा है

वफ़ा निसार हो उस की वफ़ा-शनासी पर
हज़ार गर्दिशों के बा'द भी जो मेरा है