उर्दू शायरी · ग़ज़ल

naghma-e-mina hai raqs-e-jam hai

नग़्मा-ए-मीना है रक़्स-ए-जाम है

نغمۂ مینا ہے رقص جام ہے

शायर: Sabir Abuhari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नग़्मा-ए-मीना है रक़्स-ए-जाम है
तू कहाँ ऐ गर्दिश-ए-अय्याम है

हो न जाए हुस्न पर जब तक निसार
ज़िंदगी इल्ज़ाम ही इल्ज़ाम है

उठ गए सब मय-कशान-ए-सरफ़रोश
मय-कदों में अब ख़ुदा का नाम है

फेर लीं जिस से निगाहें आप ने
उस की क़िस्मत में कहाँ आराम है

तुम ही ना-महरम हो वर्ना मय-कशो
ज़िंदगी ख़ुद इक छलकता जाम है

आदमी को मारती है ज़िंदगी
मौत पर तो मुफ़्त का इल्ज़ाम है

तेरे बस का रोग ऐ 'साबिर' नहीं
शायरी तो दिल-जलों का काम है