उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nafrat ki aandhiyon mein mera ghar nahin raha

नफ़रत की आंधियों में मिरा घर नहीं रहा

نفرت کی آندھیوں میں مرا گھر نہیں رہا

शायर: Raees Manzar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नफ़रत की आंधियों में मिरा घर नहीं रहा
लेकिन जो मेरे दिल में था वो डर नहीं रहा

छाया हुआ है ज़ह्न पे यूँ वक़्त का ग़ुबार
रौशन निगाह में कोई मंज़र नहीं रहा

हालात का दबाओ पड़ा है कुछ इस तरह
पहले जो मेरा सर था वो अब सर नहीं रहा

इफ़्लास ने पहन लिया तहज़ीब का लिबास
कासा-ब-दस्त कोई गदागर नहीं रहा

शिकवा ये कैसा रूह की तिश्ना-लबी का है
दरिया नहीं रहा कि समंदर नहीं रहा

उस दिन से ज़िंदगी को 'अजब हौसला मिला
आसाइशों का जब से मैं ख़ूगर नहीं रहा

'मंज़र' मैं आज 'अहद-ए-वफ़ा उस से तोड़ कर
मेरा जो क़द था उस के बराबर नहीं रहा