उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na uske hath ko thama na lab-kushai ki

न उस के हाथ को थामा न लब-कुशाई की

نہ اس کے ہاتھ کو تھاما نہ لب کشائی کی

शायर: Faisal Shahzad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न उस के हाथ को थामा न लब-कुशाई की
कोई भी रस्म अदा की नहीं जुदाई की

जो कह रहा था ज़रा बच के सब मुनाफ़िक़ हैं
उसी ने पीठ के पीछे मिरी बुराई की

हम अपनी क़ैद में उस को कहाँ तलक रखते
जिसे ख़ुशी थी बहुत 'इश्क़ से रिहाई की

मिरा वुजूद भी बंजर ज़मीन जैसा था
सो आँसुओं ने मिरे ज़ख़्म की तराई की

भरोसा दे दिया बदले में एक दूसरे को
'अजीब रस्म हमारी थी मुँह दिखाई की

तिरी नज़र में बुरे सिर्फ़ हम सही लेकिन
हमारे साथ भला तुम ने क्या भलाई की

जहाँ पे हाथ छुड़ाया था तुम ने 'फ़ैसल' से
वहीं पे चूड़ियाँ टूटीं तिरी कलाई की