उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dushman ko samajh aai nahin yar hamari

दुश्मन को समझ आई नहीं यार हमारी

دشمن کو سمجھ آئی نہیں یار ہماری

शायर: Faisal Shahzad7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दुश्मन को समझ आई नहीं यार हमारी
ना-हक़ कभी उट्ठी नहीं तलवार हमारी

पल भर में गिरा दी गई दीवार हमारी
बरसों की रियाज़त गई बे-कार हमारी

दुनिया से लड़े जीत मुक़द्दर हुई लेकिन
फिर रज़्म-ए-मोहब्बत में हुई हार हमारी

जिस्मों की क़राबत में कहीं रूह नहीं थी
तुम थे भी तो तन्हाई थी ग़म-ख़्वार हमारी

हम 'इश्क़ को भी दीन धरम समझे थे लेकिन
रुस्वाई मुक़द्दर बनी हर बार हमारी

कुछ इस लिए भी भर गया दिल हम से तुम्हारा
वाफ़िर थी बहुत प्यार की मिक़दार हमारी

हर शख़्स उठा कर हमें रख देता है 'फ़ैसल'
क़ीमत ही नहीं जानता बाज़ार हमारी