उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek na ek din juda hi hota hai

इक न इक दिन जुदा ही होता है

اک نہ اک دن جدا ہی ہوتا ہے

शायर: Faisal Shahzad13 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक न इक दिन जुदा ही होता है
बे-वफ़ा बे-वफ़ा ही होता है

मैं हूँ पहला उसे बता देना
दूसरा दूसरा ही होता है

'इश्क़ में ख़ुद कोई नहीं पड़ता
हर कोई मुब्तला ही होता है

क़ाफ़िले की यही हक़ीक़त है
राहज़न रहनुमा ही होता है

मस्लहत का चलन है हर जानिब
हर सितम अब रवा ही होता है

मुफ़लिसी फ़ख़्र हो नहीं सकती
तौक़-ए-ग़ुर्बत सज़ा ही होता है

'इश्क़ का कोई हल नहीं होता
ये मरज़ ला-दवा ही होता है

चाहे बट जाए या पलट जाए
रास्ता रास्ता ही होता है

ये मोहब्बत भी क्या मुसीबत है
जिस को चाहो ख़फ़ा ही होता है

जिस को हासिल हो क़ुर्बत-ए-जानाँ
उस का हर दिन नया ही होता है

ज़िंदगी का कोई भरोसा क्या
हादसा हादसा ही होता है

तुम उदासी कहाँ छुपाओगे
आइना आइना ही होता है

दिल में जिस को भी रख लिया जाए
दिल में आख़िर ख़ुदा ही होता है