उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na to main hi KHud se hun mutmain na yun hai ki mauj-e-bala nahin

न तो मैं ही ख़ुद से हूँ मुतमइन न यूँ है कि मौज-ए-बला नहीं

نہ تو میں ہی خود سے ہوں مطمئن نہ یوں ہے کہ موج بلا نہیں

शायर: Saani Araryavi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न तो मैं ही ख़ुद से हूँ मुतमइन न यूँ है कि मौज-ए-बला नहीं
प ख़ुदा-ए-पाक के रू-ब-रू कभी उठते दस्त-ए-दु'आ नहीं

ये ग़ुरूर-ओ-ज़ो'म है ना-रवा ये सितम ये ज़ुल्म है बे-सबब
तह-ए-ख़ाक तुझ को भी होना है तू भी आदमी है ख़ुदा नहीं

तू कि उस की ज़ुल्फ़ की ख़ुशबू है तिरा एक अपना मक़ाम है
तिरी रू में बाद-ए-नसीम है तू असीर-ए-बाद-ए-सबा नहीं

मुझे मुज़्तरिब ही न कर सकी वो ख़लिश वो शोख़ी-ए-नक़्श-ए-पा
तिरी चाल में वो अदा नहीं तिरी आँखों में भी हया नहीं

न फ़क़ीह-ए-शरअ' के हुक्म पर न अमीर-ए-शहर के अम्र पर
तिरे दर को छोड़ के ऐ ख़ुदा मैं किसी के दर पे झुका नहीं

मिरे दिल को आज सुकूँ नहीं मिरी जान आज है मुज़्तरिब
तिरे लब की कलियाँ खिली नहीं तिरा तीर-ए-चश्म चला नहीं

तिरे ज़ुल्म की हों वो आँधियाँ या थपेड़े मौज-ए-बला के हों
मिरा 'इश्क़ ऐसा चराग़ है जो किसी भी वक़्त बुझा नहीं

तू भी बद-गुमान है बे-सबब है अभी भी उस को तिरी तलब
उसे तन्हा ऐसे न छोड़ कि तिरा 'सानी' इतना बुरा नहीं