उर्दू शायरी · ग़ज़ल

badan ka zaKHm gul buTa nahin hai

बदन का ज़ख़्म गुल बूटा नहीं है

بدن کا زخم گل بوٹا نہیں ہے

शायर: Saani Araryavi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बदन का ज़ख़्म गुल बूटा नहीं है
फ़साना दिल का कुछ झूठा नहीं है

नए ज़ख़्मों की सौग़ातें 'अता कर
अभी ये दिल बहुत टूटा नहीं है

ग़मों की बे-सर-ओ-सामानी देखो
सलीक़े से मुझे लूटा नहीं है

अज़ल से सर पे पत्थर मारता हूँ
अभी तक मेरा सर फूटा नहीं है

तवज्जोह हो कि हो बे-इल्तिफ़ाती
अभी तक मुझ से वो रूठा नहीं है

सितम करते रहे वो फिर भी मुझ से
वफ़ा का रास्ता छूटा नहीं है