उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere tarane mere saz ka taaqub hai

मिरे तराने मिरे साज़ का त'आक़ुब है

مرے ترانے مرے ساز کا تعاقب ہے

शायर: Saani Araryavi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे तराने मिरे साज़ का त'आक़ुब है
ये नस्ल-ए-नौ की ही आवाज़ का त'आक़ुब है

पता नहीं था वो आवाज़ मेरी अपनी थी
और 'अर्से से उसी आवाज़ का त'आक़ुब है

फ़रिश्ते भी मिरी तख़्लीक़ के मुख़ालिफ़ थे
हमेशा से मिरे आग़ाज़ का त'आक़ुब है

मिरे जुनून-ए-मुसलसल की फ़िक्र मत करना
अभी तिरी निगह-ए-नाज़ का त'आक़ुब है

अभी तो महज़र-ए-हू की भी जुस्तुजू न हुई
अभी से दीदा-ए-ग़म्माज़ का त'आक़ुब है

जो पाक-दामन-ओ-'इस्याँ सरिश्त हैं बरहम
ये हुस्न-ए-तफ़रक़ा-पर्दाज़ का त'आक़ुब है

है गुफ़्तगू-ए-मन-ओ-तू का इक तजस्सुस भी
कहीं इशारा-ए-हम-राज़ का त'आक़ुब है

परों को तोड़ते जाते हैं जो सभी ताइर
इसी में हसरत-ए-परवाज़ का त'आक़ुब है

न हो सकी है किसी से भी नाज़-बरदारी
सुना है अंजुमन-ए-नाज़ का त'आक़ुब है