उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muzhda-e-manzil-e-shab aabla-pa tak pahunche

मुज़्दा-ए-मंज़िल-ए-शब आबला-पा तक पहुँचे

مژدۂ منزل شب آبلہ پا تک پہنچے

शायर: Saani Araryavi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुज़्दा-ए-मंज़िल-ए-शब आबला-पा तक पहुँचे
बात दिल की जो ख़म-ए-ज़ुल्फ़-ए-रसा तक पहुँचे

ज़रा ज़िंदाँ भी चला आए बराए मजनूँ
ये दरीचा भी कभी मौज-ए-सबा तक पहुँचे

फिर तो अंजाम मोहब्बत का ख़ुदा ही जाने
मेरी गुस्ताख़ी अगर चश्म-ए-हया तक पहुँचे

मिरी आहों की निहायत तिरे ईजाब-ओ-क़ुबूल
लब की जुम्बिश मिरे उस दिल की सदा तक पहुँचे

रात भर जागे सितारे तिरी ग़म्माज़ी में
ये तुनुक-ज़र्फ़ी मह-ए-नासिया-सा तक पहुँचे

अब क्या उम्मीद करें साज़-ए-तरब-नाक से हम
ग़म के पैग़ाम दिल-ए-नग़्मा-सरा तक पहुँचे

आसमानों की तरफ़ देखती है प्यासी ज़मीं
ये क़यामत तिरे गेसू की घटा तक पहुँचे

लब-ए-महताब ने जुम्बिश तो ज़रा की भी नहीं
गोश--ए-अंजुम सुख़न-ए-बे-सर-ओ-पा तक पहुँचे