उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na rakkha kahin ka na apna banaya

न रक्खा कहीं का न अपना बनाया

نہ رکھا کہیں کا نہ اپنا بنایا

शायर: Aal-e-Raza Raza6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न रक्खा कहीं का न अपना बनाया
वो क्या चाहते हैं समझ में न आया

दिया दिल तो कैफ़-ए-वफ़ा हाथ आया
वो क्या जाने जिस ने न खोया न पाया

यही फ़र्ज़ कर लो कि दर्द-ए-मोहब्बत
न तुम ने सुना और न मैं ने सुनाया

कड़ी धूप में है मोहब्बत की मंज़िल
ज़रा देर का है सर-ए-राह साया

नशेमन ग़रीबों के उजड़े पड़े हैं
हवा-ए-गुलिस्ताँ को चलना न आया

'रज़ा' खेलना था ग़म-ए-ज़िंदगी से
मोहब्बत को हम ने वसीला बनाया