उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na pas-e-falak na sar-e-zamin main kahin nahin

न पस-ए-फ़लक न सर-ए-ज़मीं मैं कहीं नहीं

نہ پس فلک نہ سر زمیں میں کہیں نہیں

शायर: Umair Najmi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न पस-ए-फ़लक न सर-ए-ज़मीं मैं कहीं नहीं
ब-ख़ुदा तलाशा है हर कहीं मैं कहीं नहीं

ये जो आइने के है रू-ब-रू ये हूँ मैं कि तू
तिरे होंठ आँखें तिरी जबीं मैं कहीं नहीं

ये जहाँ तमाशा है और उस ने तराशा है
वो तमाशा-गर वो तमाशबीं मैं कहीं नहीं

दम-ए-अव्वलीं से ये खोज थी कि कहाँ हूँ मैं
ये पता चला दम-ए-आख़रीं मैं कहीं नहीं

ये हवा-ए-कुन में फ़ना की धुन इसे तू भी सुन
मिरे साथ गा मैं कहीं नहीं मैं कहीं नहीं

तू ब-ग़ौर देख अभी मुझे किसी तौर देख
कहीं हो न जाए मुझे यक़ीं मैं कहीं नहीं

कई बार झाँका है वक़्त में बड़ी दूर तक
हैं कुछ और लोग तिरे क़रीं मैं कहीं नहीं