उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na dasht hi ke liye hun na gulsitan ke liye

न दश्त ही के लिए हूँ न गुलसिताँ के लिए

نہ دشت ہی کے لیے ہوں نہ گلستاں کے لیے

शायर: Balraj Bakhshi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न दश्त ही के लिए हूँ न गुलसिताँ के लिए
कोई बताए कि आख़िर हूँ मैं कहाँ के लिए

वो एक अब्र का टुकड़ा मैं एक बूँद आँसू
कहाँ कहाँ के लिए वो मैं हूँ कहाँ के लिए

ये कम नहीं है कि जब भी तुम्हारी बात चली
मिरा ही ज़िक्र हुआ ज़ेब-ए-दास्ताँ के लिए

वो मेरे शौक़ के आगे जो ख़म-पज़ीर हुआ
फिर उस ने कुछ भी न रक्खा मिरे गुमाँ के लिए

तिरा सबक़ न किसी काम आ सका 'बलराज'
सवाल और ज़रूरी थे इम्तिहाँ के लिए