उर्दू शायरी · ग़ज़ल

musalsal usko ye gham kha raha hai

मुसलसल उस को ये ग़म खा रहा है

مسلسل اس کو یہ غم کھا رہا ہے

शायर: Danish Noorpuri9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुसलसल उस को ये ग़म खा रहा है
मिरा क़द रोज़ बढ़ता जा रहा है

नक़ाब-ए-रुख़ को उल्टा जा रहा है
अंधेरा अब बहुत घबरा रहा है

यक़ीं उन को भी होता जा रहा है
कोई दानिस्ता धोका खा रहा है

बनाई जिस ने सारी 'उम्र दुनिया
कफ़-ए-अफ़सोस मलता जा रहा है

बहुत तेज़ी है दिल की धड़कनों में
यक़ीनन आज कोई आ रहा है

तुम्हारी याद का हर इक शगूफ़ा
हमारी ज़िंदगी महका रहा है

उसे चेहरे पे है इतना भरोसा
वो आईने बदलता जा रहा है

सितम के तीर का हर वार ज़ालिम
'अज़ाइम को मिरे चमका रहा है

फ़रेब उस ने दिया है मुझ को 'दानिश'
वो मिलने से बहुत कतरा रहा है