उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hawa ke ruKH pe khuli zulf-e-yar lagti hai

हवा के रुख़ पे खुली ज़ुल्फ़-ए-यार लगती है

ہوا کے رخ پہ کھلی زلف یار لگتی ہے

शायर: Danish Noorpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हवा के रुख़ पे खुली ज़ुल्फ़-ए-यार लगती है
नसीम-ए-सुब्ह बहुत मुश्कबार लगती है

अदा हमारी उसे नागवार लगती है
ये सादगी भी उसे कारोबार लगती है

तिरे बग़ैर तो गुल-बूटे ख़ार लगते हैं
तू साथ है तो ख़िज़ाँ भी बहार लगती है

तमाम रात ही करवट बदलते रहते हो
तुम्हारे दोष पे दुनिया सवार लगती है

उदासियों का है सहरा किसी के चेहरे पर
ये काएनात बड़ी सोगवार लगती है

जिसे भी देखिए तर है वो ख़ून में 'दानिश'
ये सारी बस्ती हमें ख़ार-दार लगती है