उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mukammal mohabbat ka dastur dekha

मुकम्मल मोहब्बत का दस्तूर देखा

مکمل محبت کا دستور دیکھا

शायर: Qadr Oraizi10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुकम्मल मोहब्बत का दस्तूर देखा
यहीं सारी दुनिया को मजबूर देखा

हर इक सम्त मैं ने नया तूर देखा
जिधर आँख उठाई उधर नूर देखा

फ़रेब-आश्नाओं को मुख़्तार पाया
सदाक़त-पसंदों को मजबूर देखा

हर इक दौर के साथ दस्तूर बदला
अटल एक क़ुदरत का दस्तूर देखा

क़दम राह-ए-उल्फ़त में रखते ही मैं ने
हुज़ूर अच्छे-अच्छों को मजबूर देखा

जिन आँखों ने देखी हैं आँखें तुम्हारी
हमेशा उन आँखों को मख़मूर देखा

किसी ने सर-ए-तूर दिल में किसी ने
हर इक ने उसे ता-ब-मक़्दूर देखा

मोहब्बत के इक़बाल से हुस्न को भी
मोहब्बत का मम्नून-ओ-मशकूर देखा

ख़ुदा की क़सम मैं ने देखा जहाँ तक
ख़ुदा के सिवा सब को मजबूर देखा

हुई बा'द मुर्दन भी ऐ 'क़द्र' हैरत
जो बनते हुए रूह को हूर देखा