उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe un se mohabbat ho chali hai

मुझे उन से मोहब्बत हो चली है

مجھے ان سے محبت ہو چلی ہے

शायर: Sabir Abuhari9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे उन से मोहब्बत हो चली है
तड़पना दिल की क़िस्मत हो चली है

अदावत और नफ़रत या-इलाही
तिरे बंदों की फ़ितरत हो चली है

हक़ीक़त थी कभी तौक़ीर-ए-आदम
मगर अब तो हिकायत हो चली है

करम ये भी है तेरी बे-रुख़ी का
मुझे अब ख़ुद से नफ़रत हो चली है

इबादत का सिला हैं हूर-ओ-ग़िल्माँ
इबादत भी तिजारत हो चली है

हमीं पर है निगाह-ए-क़हर उन की
हमीं पर ये इनायत हो चली है

मरासिम ख़ूब-रूओं से बढ़ाना
दिल-ए-नादाँ की आदत हो चली है

करम होने लगा अहल-ए-हवस पर
इलाही क्या क़यामत हो चली है

वफ़ा पर तो न जाने क्या हो 'साबिर'
जफ़ा ही पर 'मसर्रत' हो चली है