उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhko darun-e-zat ka naqsha dikhai de

मुझ को दरून-ए-ज़ात का नक़्शा दिखाई दे

مجھ کو درون ذات کا نقشہ دکھائی دے

शायर: Zaheer Ahmad8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझ को दरून-ए-ज़ात का नक़्शा दिखाई दे
आईना वो दिखाओ कि चेहरा दिखाई दे

आदाब-ए-तिश्नगी ने सिखाए हैं वो हुनर
प्यासे को मुश्त-ए-ख़ाक में कूज़ा दिखाई दे

ऐसी रही हैं निस्बतें दीवार-ए-यार से
कू-ए-सितम की धूप भी साया दिखाई दे

हर लब पे हर्फ़-ए-वा’ज़-ओ-नसीहत है शहर में
हर शख़्स आसमान से उतरा दिखाई दे

अफ़्शाँ किसी किसी में ही अनवार-ए-फ़ैज़ है
वैसे तो हर चराग़ ही जलता दिखाई दे

उन के वरक़ वरक़ पे है नाम-ए-ख़ुदा रक़म
जिन की किताब-ए-ज़िंदगी सादा दिखाई दे

तमसील-गाह-ए-वक़्त में बैठे हैं मुंतज़िर
पर्दा उठे तो कोई तमाशा दिखाई दे

दुनिया फ़रेब-ज़ार-ए-नज़र है 'अजब 'ज़हीर'
आँखें न हों तो ख़ाक भी सोना दिखाई दे